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लखनऊ: उत्तर प्रदेश में आगामी चुनावों से पहले सभी राजनीतिक दल अपनी रणनीति तैयार करने में जुट गए। बीते दिनों बसपा और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की खबरों को बसपा सुप्रीमो मायावती ने सिरे से नकार दिया। ऐसे में ये सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसी कौन-सी वजह है कि बसपा, सपा और यहां तक कि कांग्रेस भी AIMIM से हाथ नहीं मिलाना चाहती?

दरअसल बीते दिनों कयास लगाए जा रहे थे कि यूपी में आगामी विधानसभा चुनाव बसपा और AIMIM साथ मिलकर लड़ेंगी। जिसके बाद बसपा सुप्रीमो मायावती ने एक ट्वीट करते हुए इन अटकलों पर विराम लगा दिया। मायावती ने लिखा-‘मीडिया के एक न्यूज चैनल में कल से यह खबर प्रसारित की जा रही है कि यूपी में आगामी विधानसभा आमचुनाव औवेसी की पार्टी AIMIM व बीएसपी मिलकर लड़ेगी। यह खबर पूर्णतः गलत, भ्रामक व तथ्यहीन है। इसमें रत्तीभर भी सच्चाई नहीं है तथा बीएसपी इसका जोरदार खण्डन करती है।’ मायावती ने आगे लिखा-‘वैसे इस सम्बन्ध में पार्टी द्वारा फिर से यह स्पष्ट किया जाता है कि पंजाब को छोड़कर, यूपी व उत्तराखण्ड प्रदेश में अगले वर्ष के प्रारंभ में होने वाला विधानसभा का यह आमचुनाव बीएसपी किसी भी पार्टी के साथ कोई भी गठबन्धन करके नहीं लड़ेगी अर्थात् अकेले ही लड़ेगी।

दूसरी तरफ सपा प्रमुख अखिलेश यादव सूबे के छोटे-छोटे दलों के साथ चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे है लेकिन वो भी ओवैसी के साथ गठबंधन नहीं करना चाहते। कुछ समय पहले जब उनके और ओवैसी के गठबंधन पर सवाल किया गया था तो उन्होंने कहा था कि संसद में पहले ओवैसी उनके बगल में ही बैठते थे लेकिन तब वो उस प्रकार की सियासत नहीं करते थे। फिलहाल ये सब जानते हैं कि वो आजकल किसके लिए काम कर रहे हैं। अखिलेश ने आगे स्पष्ट करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में हमारा तीन पार्टियों से गठबंधन है और जो भाजपा से मिले हुए है सपा उनसे दूर ही रहेगी। सपा और बसपा के बाद कांग्रेस ने भी साफ कर दिया है कि वह उत्तर प्रदेश की किसी पार्टी के साथ गठबंधन नहीं करेगी।

गौरतलब है कि असदुद्दीन ओवैसी उत्तर प्रदेश चुनावी मैदान में उतरकर आसानी से मुस्लिम वोट हासिल कर सकते हैं और इस तरह सेक्युलर दलों का राजनीतिक एजेंडा बिगड़ सकता है। अगर उन्हें मुस्लिम वोट नहीं भी मिलते हैं तो वो अपनी सियासी रणनीति के ज़रिए हिन्दू वोट भी हासिल कर सकते है। ऐसे में सेक्युलर कहलाने वाली पार्टियां अगर ओवैसी के साथ गठजोड़ करती हैं तो उनपर मुस्लिम परस्त और कट्टरपंथी पार्टी के साथ होने का आरोप लगाया जा सकता है। यही कारण है कि सभी पार्टियां ओवैसी से दूरी बनाकर हैं। हालांकि ओवैसी ने ओमप्रकाश राजभर के नेतृत्व वाले भागीदारी संकल्प मोर्चा से हाथ मिलाया हुआ है।

 

 

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