Contact Information / सम्पर्क जानकारी

C-125,1st Floor,Sector-02 Noida,Uttar,Uttar Pradesh - 201301

Call Us / सम्पर्क करें

लग चूका शामियाना, सज गया स्टेज और बज उठी शहनाई भी, बस अब इंतज़ार है लोगों के आने का और अपने दूल्हे ढूंढ़ने का, जिनके सिर बंधेगा सेहरा और जिनके नाम का बजेगा शहरों में ढोल और उन्ही के हवाले होगी अगले पांच सालों की डोर। जी हाँ अब 5 राज्यों में ऐसे दूल्हों की तलाश है जिनके सिर पे सजेगा उस राज्य का खूबसूरत ताज, और फिर अगले 5 सालों तक उस राज्य की कमान उन्ही के हाथों सौंप दी जायेगी।

जैसे जैसे चुनावी सरगर्मी बढ़ रही है, वैसे वैसे विभिन्न राजनितिक दलों में आपसी होड़ बढ़ती जा रही है। ये होड़ है हकीकत से कोसों दूर, लुभावने और झूठे वादों की झड़ी लगाने की। चुनाव की तारीखों की घोषणा हो चुकी है और कोरोना महामारी के बीच लोगों से वोट की भीख मांगते अलग -अलग राजनीतिक पार्टियों के इन नेताओं की हालत अभी बिलकुल ऐसी होती है, मानो हर नेता के दिल की धड़कन बढ़ गई हो, दिमाग़ी सुकून छीन गया हो और उसकी सारी मिलकियत दाव पर लग गई हो।

इसी बेचैनी में ये नेता चुनावी मैदान में मुहं में जो भी आ जाता है, बस उसी का वादा करते आगे बढ़ते जाते हैं। चुनावी मैदान में अपने वादों की गारेंटी की बात करने का समय न उन नेताओं के पास होता है, न ही वहां की स्थानीय जनता के पास। यही हाल लगभग सभी राजनितिक दलों के नेताओं और उम्मीदवारों का होता है। बस इसी उधेड़बून में समय बीतता जाता है और बाद में जो जीता वही सिकंदर कहलाता है।

चुनाव ख़त्म होते ही, कैसे वादे, कौन से वादे, कहाँ के वादे, चर्चा और बहस इस पर शुरू हो जाती है। इसी दर्द को लिए जनता फिर अगले 5 सालों तक ऊहापोह की स्थिति में रहती है, तकलीफ होती है पर उसका इलाज नहीं हो पाता क्योंकि यही सारे नेता चुना में विजयी होने के बाद अपने ऐश ओ आराम में व्यस्त हो जाते हैं। बल्कि कई नेताओं के पास तो अपने क्षेत्रों में जाने का भी शायद समय नहीं मिल पाता, क्योंकि उन्हें अब उस क्षेत्र और उसकी जनता की आवश्यकता अगले 5 साल के बाद ही होनी होती है।

हमारे देश में चुनाव को एक त्यौहार की तरह ही देखा और समझा जाता है। माना जाता है की चुनाव का वक़्त ऐसे जश्न का वक़्त होता है जब जनता से लेकर राजनितिक पार्टियों के नेता सभी अच्छा अच्छा सोंचते और कहते नज़र आते हैं।
हर तरफ जश्न जैसी तैयारियां होती हैं और जैसे ही चुनाव आयोग, चुनाव की तारीखों का एलान करता है, बस समझो शहनाई बज उठी और दूल्हे के सिर सेहरा बंधने ही वाला है।

हम ये जानना चाहते हैं की चुनाव के वक़्त लगाई जाने वाली वादों की लड़ियों का क्या कोई पुरसान ए हाल भी होता है? क्या कभी इन वादों को हकीकत में बदलने की भी कोई कोशिश होती है ? नहीं, बिलकुल नहीं, वरना अगर ऐसा होता तो हर 5 सालों में सरकारें नहीं बदली जाती और जाती हुई सरकारें रोती, गिड़गिड़ाती नज़र नहीं आती।

क्या ही बेहतर होता की वादों की झड़ियाँ, सरकारें चुने जाने के बाद खूबसूरत फूलों की झड़ियों में बदल जाती। लोगों को रोज़गार के लिए दर ब दर भटकना नहीं पड़ता, टूटी और खस्ता हाल गलियों और सड़कों पर चलते हुए लोगों को रोना नहीं पड़ता। आम जनता को महंगाई के मार झेलते हुए दो चार होना नहीं पड़ता। लेकिन ये सब तो तब ही होगा न जब हम और आप इन लुभावने वादों के झांसे में ना आते हुए, पूरी सूझ बुझ के साथ अपनी नई सरकार का चुनाव करेंगे। ज़रूरत इसी बात की है की हम अपने वोट के महत्त्व को पहचानते हुए, सियासी दलों के वादों की लम्बी फेहरिस्त की सच्चाई को समझ सकें और फिर अपने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए अपने बेहतरी की सुन्दर राह स्वयं बना सकें।

(सैयद असदर अली)


administrator

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *