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नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने रेडियो कार्यक्रम मन की बात की 81वीं कड़ी को नदियों को समर्पित किया और लोगों से नदियों के साथ फिर से जुड़ाव बढ़ाने की अपील करने के साथ ही जीवन एवं व्यवहार में स्वच्छता को अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया।

अपनी अमेरिका यात्रा से पहले रिकार्ड किए गए संबोधन में श्री मोदी ने खादी और स्थानीय उत्पादों को प्रोत्साहित करने और गांधी जयंती से शुरू होने वाली खादी उत्पादों की विशेष बिक्री में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने की अपील की। उन्होंने भारत में डिजिटल भुगतान और जनधन खातों के क्षेत्र में प्रगति का उल्लेख करते हुए उसको भी एक तरह का स्वच्छता अभियान बताया।

प्रधानमंत्री ने कहा, “सितम्बर में जिस दिन ‘मन की बात’ है, उसी तारीख को ‘विश्व नदी दिवस’ है।” उन्होंने संस्कृत श्लोक-“पिबन्ति नद्यः, स्वयं-मेव नाम्भः अर्थात् नदियाँ अपना जल खुद नहीं पीती, बल्कि परोपकार के लिये देती हैं। हमारे लिये नदियाँ एक भौतिक वस्तु नहीं हैं, हमारे लिए नदी एक जीवंत इकाई है, और तभी तो, तभी तो हम, नदियों को माँ कहते हैं। माघ का महीना आता है तो हमारे देश में बहुत लोग पूरे एक महीने माँ गंगा या किसी और नदी के किनारे कल्पवास करते हैं।”

भारत में स्नान करते समय एक श्लोक बोलने की परंपरा रही है- “गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरी जले अस्मिन् सन्निधिं कुरु।” पहले हमारे घरों में परिवार के बड़े ये श्लोक बच्चों को याद करवाते थे और इससे हमारे देश में नदियों को लेकर आस्था भी पैदा होती थी। विशाल भारत का एक मानचित्र मन में अंकित हो जाता था। नदियों के प्रति जुड़ाव बनता था।

प्रधानमंत्री ने कहा कि पर आज यह स्वाभाविक है कि हर कोई एक प्रश्न उठाएगा और प्रश्न उठाने का हक भी है और इसका जवाब देना ये हमारी जिम्मेवारी भी है कि नदी को माँ कह रहे हो तो ये नदी प्रदूषित क्यों हो जाती है?
उन्होंने कहा,“ हम नदियों की सफाई और उन्हें प्रदूषण से मुक्त करने का काम सबके प्रयास और सबके सहयोग से कर ही सकते हैं। ‘नमामि गंगे मिशन’ भी आज आगे बढ़ रहा है तो इसमें सभी लोगों के प्रयास, एक प्रकार से जन-जागृति, जन-आंदोलन, उसकी बहुत बड़ी भूमिका है।”

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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