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बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान नीतीश सरकार के खिलाफ जो आंधी चली थी उसे दुनिया ने देखा। पीएम मोदी यूपी के सीएम योगी से लेकर केंद्रीय मंत्रियों और स्टार प्रचारकों की एक बड़ी सेना बिहार में विराजमान थी। उनकी चुनावी सभाओं में खाली कुर्सियों को भी लोगों ने देखा। नीतीश कुमार की सभाओं में हंगामा करने, चप्पल उछालने का दृश्य भी सबने देखा। अपने क्षेत्रों में बिहार के मंत्रियों को जनता के दौड़ाते हुए भी लोगों ने देखा और तेजस्वी यादव की चुनावी सभाओं में जनसैलाब और नौजवानों के जोश को भी दुनिया ने देखा। गुमान यही था कि नीतीश सरकार के खिलाफ तेजस्वी की आंधी एनडीए की सत्ता के परखच्चे उड़ा देगी। मगर दुनिया ने सियासत का यह सितम भी देखा कि कैसे बिहार में भाजपा का पासा पलटा, तिकड़म कामयाब हुई और नीतीश एक कठपुतली मुख्यमंत्री के तौर पर गद्दी पर बैठे।

आज बिहार की सूरतेहाल यह है कि जिस सुशासन बाबू ने अपनी चुनावी सभाओं में चिल्ला-चिल्ला कर कहा था कि अगर उनकी सरकार नहीं बनी तो बिहार में जंगल राज आ जाएगा और अब उन्हीं के दौर में बिहार में न केवल जंगल राज आ चुका है, बल्कि सारी सीमाओं को भी पार कर चुका है। प्रजातंत्र की जननी कहा जाने वाला बिहार हत्याओं और बलात्कार का केंद्र बनकर रह गया है। कानून व्यवस्था की हालत इतनी खस्ता हो चुकी है कि कब क्या हो जाए, कहा नहीं जा सकता है।

आलम यह है कि रोजाना लूटपाट, हत्या, बलात्कार आदि की खबरें आना आम बात हो चुकी है, फला शख्स मारा गया फला नेता ढेर हुआ, लड़की की सामूहिक बलात्कार के बाद हत्या, मोटर साइकिल सवारों की दिनदहाड़े बर्बरता, एटीएम की लूट, ज्वैलर की दुकान पर डाका, शराबबंदी के बावजूद शराब की जमाखोरी में इजाफा, लेकिन अगर कोई सरकार के खिलाफ आवाज उठाता है। धरने पर बैठता है, प्रदर्शन करता है तो उस पर लाठचार्ज।

शर्मनाक बात तो यह है कि चुनाव में 19 लाख नौकरियां देने की डुगडुगी बजाने वाले सत्ता हथियाने के बाद उसी तरह से चुप हैं कि जिस तरह से 15 लाख हर खाते में डालने की बात कहकर चुप हो गये थे। विडंबना तो यह भी है कि बिहार में एक ऐसा तुगलकी फरमान भी जारी हुआ है कि जिससे जमहूरियत का गला घुटता नजर आ रहा है। इस फरमान के मुताबिक अगर किसी युवक ने धरना-प्रदर्शन आंदोलन में भाग लिया, पकड़े गया तो सरकारी नौकरी से और दूसरी सुविधाओं से वंचित कर दिया जाएगा। गोया बिहार के बेरोजगारों के हालत आसमान से गिरे खजूर पर अटके जैसी हो गई है।

बिहार में विधि व्यवस्था की हालत शर्मनाक हद तक गिर चुकी है। स्टेट क्राइम रिपोर्ट के मुताबिक गत साल सितम्बर तक बलात्कार के 1106 मामले हुए थे और फिरौती के 152 मामले सामने आये थे। जनवरी से सितम्बर तक 2306 हत्याएं हुई थीं। यानी नीतीश के पिछले दौर में रोजाना 9 कत्ल होने का रिकार्ड बना था, लेकिन चुनाव के बाद मात्र दो महीने में ये रिकार्ड भी टूट चुका है।

बिहार में कत्ल और बलात्कार के मामले गत वर्ष के मुकाबले डेढ़ गुणा बढ़ चुके हैं। राज्य में अपराध के बढ़ते ग्राफ के तहत नीतीश कुमार चार बार पुलिस के साथ हाई लेवल मीटिंग कर चुके हैं। इंडिगो एयरलाइन के मैनेजर रूपेश कुमार कत्ल मामले में थू-थू होने पर नीतीश स्वयं पुलिस हेडक्वार्टर पहुंचकर अफसरों के निकम्मेपन पर जवाबतलबी कर चुके हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि बिहार में कानून व्यवस्था के कर्ताधर्ता इस जवाब तलबी को महाजुमला समझकर नजरअंदाज कर रहे हैं।

एक ओर बिहार में अपराध आसमान छू रहा है तो दूसरी ओर घोटालों की भी धूम मची हुई है। एक के बाद एक सरकारी घपले बिहार की कोख से निकल रहे हैं। स्वास्थ्य हो, शिक्षा हो, बाढ़ हो, कोविड आइसोलेशन हो, हर ओर लूट मची हुई है। अब तो कोरोना जांच के नाम पर फर्जीवाड़ा चल रहा है। कोविड जांच या वैक्सीन का मामला भी कटहरे पर है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने नीतीश सरकार पर कोविड जांच मामले में अरबों के घोटाले का आरोप लगाया है और जांच की मांग की है। उन्होंने 3300 करोड़ के सीजन घोटाले के साथ-साथ बिहार के 55 घोटालों का भी सवाल खड़ा किया है, जो नीतीश की 15 वर्षीय सरकार में हुए हैं। उन्होंने बीते साल पटना में आई बाढ़ में राहत कार्यों पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए घोटालों का आरोप लगाया है।

मौजूदा समय में बिहार विधानसभा चुनाव में घोटाले की खबरें आ रही हैं। करोड़ों के घपले का मामला सामने आ रहा है। लेकिन तेजस्वी का सबसे बड़ा निशाना कोरोना घोटाले पर है। जहां कोविड जांच के नाम पर फर्जीवाड़े का एक लंबा सिललिसा चल रहा है। उनका कहना है कि हर जिले की जांच हुई तो यह घोटाला अरबों तक पहुंच जाएगा और देश का सबसे बड़ा घोटाला बन जाएगा, जो इंसानों की जान बचाने के नाम पर अपनी तिजोरी भरने के लिए अधिकारियों, एनजीओ और राजनीतिज्ञों ने मिलकर किया है।

इसी सिलसिले में बीते 12 फरवरी को आरजेडी के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने संसद में बिहार में हुए कोरोना घोटाले की जांच के लिए हाईलेवल कमेटी बनाने की मांग की है। अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस ने बिहार में कोविड जांच के नाम पर फर्जी तरीके से फंड की बंदरबांट का जो पर्दाफाश किया है, उससे न केवल देश चौंक गया है बल्कि सुशासन बाबू की ईमानदारी और काबिलयत पर भी दाग लग गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में सात दिनों के अंदर 10 हजार कोविड टेस्टिंग का दावा किया गया, लेकिन फिर कोरोना टेस्टिंग के एक लाख दावे कर दिये गये, जबकि अगले 14 दिनों में दो लाख का जिक्र किया गया। मगर यह सब एक फ्रॉड के सिवा कुछ नहीं। न कहीं जांच हुई, न मरीज़ आए, बस कागजी खानापूर्ति हुई। मजे की बात तो यह है कि जिनकी जांच हुई, कागजात में उनके मोबाइल नंबर भी दस अंकों के बजाए 9 दिखाए गए। बहुत सारे मोबाइल नं. गलत निकले। फार्म के कई खाने खाली छोड़े गए। कई मामलों में मरीजों के नाम फर्जी पाए गए। ऐसे फर्जीवाड़े के मामले बिहार के तीन जिले- पटना, शेखपुरा और जमुई में पाए गए। जबकि बिहार के शेष 35 जिलों की जांच की जाए तो वहां भी कोरोना जांच के मामले में परिणाम ज़ीरो/सन्नाटा ही आएगा।

कोविड जांच में शर्मनाक घोटाले ने मुल्क को आश्चर्यचकित कर दिया है। बहरहाल, नीतीश सरकार ने जांच के आदेश दे दिए हैं। लेकिन इस मामले में लीपापोती भी हो रही है। जमुई के कई स्वास्थ्य अधिकारी निलंबित कर दिए गए हैं। 22 डिस्ट्रीब्यूटर्स को नोटिस दिया गया है, लेकिन असल गुरू घंटाल कौन है, यह जांच का विषय है। गौरतलब है कि जमुई में जनवरी में 558 लोगों की जांच दिखाई गई, लेकिन 99 फीसद जांच फर्जी निकली। एक दूसरे ब्लॉक में 320 जांच में केवल 12 असली पाए गए। जमुई शहर में 150 में से 95 फर्जी निकले। एक ब्लॉक में 208 में 165 गलत पाए गए। बरहट ब्लॉक में आरटीपीसीआर कराने वाले 26 लोगों के नाम पर एक ही मोबाइल का नाम दर्ज पाया गया। जो बांका के किसी बेजू रजक का है। जिसका कहना है कि मुझे जमुई से कोई लेना देना नहीं है। मैं बांका में इलाज कराऊंगा न कि जमुई में जाकर।

खास बात तो यह है कि कोरोना के मामले में कोविड आईसोलेशन वार्ड और अन्य मामलों में उदासीन सरकार जांच के नाम पर जो चुस्ती-फुर्ती दिखा रही है। यह तेजी भी कटघरे में है। सात दिनों में रोजाना 10000 टेस्ट के बजाय एक लाख और 25 दिनों में दो लाख का टोरगेट पूरा करने का दावा आज खुद स्वास्थ्य विभाग के गले की हड्डी बन गया है।

इंसानी जिंदगी बचाने के नाम पर बिहार में जो शैतानी का खेल हुआ है या हो रहा है, वह निश्चित तौर पर उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच का तकाजा है। बिहार में हर स्तर पर बढ़ते अपराध और हर डगर पर आर्थिक बदहाली के युग में अब कोरोना जांच में फर्जीवाड़ा का शर्मनाक मामला नीतीश सरकार के सामने हाथ जोड़े खड़ा है। लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा तो देंगे नहीं। लेकिन क्या वह अपने स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे से इस्तीफा लेने का हौसला दिखा सकते है। ताकि कोविड टेस्ट में हुए घोटाले की जांच पारदर्शिता के साथ हो सके लेकिन यह भी विडंबना है कि नीतीश कुमार जो कल तक अपने फैसलों को स्वयं लेने के लिए सक्षम थे आज एक कठपुतली मुख्यमंत्री दिखाई दे रहे हैं। उनके दो माह की सत्ता के दौरान न केवल कानून व्यवस्था बल्कि सारे डिपार्टमेंट की डोर उनके हाथ से फिसलती नजर आ रही है। यह सब कैसे हो रहा है? क्या नीतीश कुमार ने भाजपा के आगे हथियार डाल दिये हैं? या जानबूझकर वह ऐसा कर रहे हैं ताकि भाजपा बदनाम हो, जो बिहार विधि व्यवस्था को लेकर उन्हीं पर आरोप लगा रही है और उन्हें एक मोहरे की तरह इस्तेमाल कर रही है।

इसलिए नीतीश कुमार भी हम तो डूबे हैं सनम तुमको भी ले डूबेंगे की राह पर चल पड़े हैं। बहरहाल, वक्त आ गया है कि नीतीश अपनी अत्यंत कमजोर सत्ता को छोडक़र पदमुक्त हो जाएं और युवा नेता तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाएं। बिहारवासियों से दिल जोड़ें, एक अभिभावक का रोल अदा करें, उनके इस कदम से उनके लिए केंद्र में भी बड़ा रोल अदा करने का रास्ता खुलेगा और उनकी गिरती हुई साख को भी मजबूती मिलेगी।

बकौल जिगर-
“उनकी जो बात है वो अहल-ए-सियासत जाने
मेरा पैगाम मोहब्बत है जहां तक पहुंचे”

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