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दिल्ली की सीमाओं पर किसान 75 दिनों से डेरा जमाए बैठे हैं। उनके आंदोलन ने अब विकराल रूप ले लिया है। उसको कम करने के लिए सरकार ने जिस तरह से दिल्ली की सीमाओं पर किलाबंदी की है। उसकी पूरी दुनिया में आलोचना हो रही है। इसे प्रजातंत्र और इंसानियत के खिलाफ करार दिया जा रहा है। विश्वविख्यात कई सेलिब्रिटीज ने इस पर चिंता व्यक्त की है। अमेरिकी सिंगर रिहाना और पर्यावरण एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग के एक ट्वीट ने भारतीय सत्ता को जो आईना दिखाया है उस पर पूरा गोदी मीडिया, भाजपा के नेता, बॉलीवुड के चमकते सितारे और क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले लोगों तक में खूब हल्ला मचा हुआ है। इस हो हल्ला से वे खुद दुनिया में उपहास का पात्र बन रहे हैं और किसान आंदोलन न केवल राष्ट्रीय पर बल्कि वैश्विक सतह पर भी सच की आवाज बनकर सत्ता के मठाधीशों के आगे सवाल बनकर खड़ा है।

दिल्ली में 26 जनवरी के दुखद वाक्या के बाद किसान आंदोलन एक तरह से आईसीयू में चला गया था, लेकिन किसान नेता, राकेश टिकैत के आंसूओं ने आंदोलन को नया जीवन दे दिया। मात्र 24 घंटे के अंदर आंदोलन ने ऐसा यूं टर्न लिया, जिससे मायूस किसानों के चेहरों पर रौनक लौट आई। टिकैत की हिमायत में हरियाणा, मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत, बिजनौर और मथुरा के अलावा हरियाणा के करनाल, जींद से किसानों का एक रेला रातों रात दिल्ली के बार्डर की ओर कूच कर गया और देखते ही देखते किसान आंदोलन पहले से ज्यादा शक्तिशाली और व्यापक आंदोलन बन गया। किसानों की इस बढ़ती हुई ताकत से हुकूमत भी घबरा गई। आनन फानन में बार्डर की किलाबंदी कर दी गई। किसानों को  रोकने के लिए कटीले तार लगाये गये, दीवारें उठा गईं, गढ्डे खोदे गये, पांच लेयर के बेरीकेडिंग की गई और सडक़ों पर कीलें तक गाड़ दी गई। बड़ी तादाद में जवान भी तैनात कर दिये गये। आंदोलन की आवाज दबाने के लिए बार्डर पर मोबाइल और इंटरनेट सर्विस खत्म कर दी गई। मगर किसानों का हौसला नहीं टूटा। उन्होंने इस किलेबंदी का जवाब 6 फरवरी को चक्काजाम के द्वारा दिया। यह देशव्यापी चक्का जाम जनता के गम और गुस्से का ऐसा प्रतिबिंद था, जिसने सिद्ध किया कि किसान आंदोलन न केवल जन आंदोलन बन चुका है बल्कि इसने सडक़ से संसद तक घमासान मचा दिया है। 

इस आंदोलन की धमक विदेशियों में भी खूब गूंज रही है। बर्तानिया की संसद से लेकर अमेरिका, कनाडा, सूडान और संयुक्त राष्ट्र संघ आदि तक भारत के महान प्रजातंत्र की बेबसी पर आवाजें उठ रही हैं। कई विश्वविख्यात सेलीब्रिटीज किसानों आंदोलन के हिमायत में खड़े हो चुके हैं। अमेरिका की प्रसिद्ध गायिका रिहाना, पर्यावरण एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग, अमेरिकी अभिनेत्री, अमांडा से लेकर अमेरिकी उप राष्ट्रपति कमला हैरिस की भतीजी, मीना हैरिस जैसी लोकप्रिय महिलाओं ने किसानों की आवाज दबाने के खिलाफ ट्वीट क्या कर दिया है कि अब गोदी मीडिया भाजपाआरएसएस के नेता, बॉलीवुड के अभिनेता और क्रिकेट के खिलाड़ी तक आस्तीनें चढ़ाए खड़े हुए हैं। इसे भारत के अंदरूनी मामले में हस्तक्षेप बताया जा रहा है। ट्वीटर पर रिहाना और ग्रेटा की छवि की बखिया उधेड़ी जा रही है। जिस तरह से दिल्ली बॉर्डर पर किलाबंदी की गई है, उसी तरह ट्विटर और मीडिया में इन दो महिलाओं के खिलाफ मोर्चाबंदी हो रही है। इन दोनों जगहों पर मोर्चाबंदी से दुनिया में भारत की महान छवि धूमिल हो रही है। शशि थरूर का कहना है कि भारत की छवि को बचाने के लिए ये हंगामे खत्म होने चाहिए। मगर जिस दौर में इंसानियत और जमीर की आवाज और सच्चाई की पुकार स्वयंभू राष्ट्रवाद के चाबुक से खामोश की जा रही है होजहां संवैधानिक संस्थाएं और न्यायालय तक दबाव में हों। ऐसे दौर में सत्ता के नशे में चूर मठाधीशों को भला इसकी परवाह ही क्या है ?

32 साल की अमेरिकी गायिका, रिहाना और 21 वर्षीय पर्यावरण एक्टिविस्ट, ग्रेटा थनबर्ग के ट्वीट ने सोशल मीडिया से लेकर गोदी मीडिया तक में कोहराम मचा दिया है। राजनेताओं से लेकर फिल्मी सितारों, संगीतकारों और क्रिकेट के खिलाडिय़ों द्वारा इन दो महिलाओं की लानत-मलामत की डफली बजाई जा रही है और आश्चर्य तो यह भी है कि ट्वीट से मुल्क खतरे में पड़ गया है। किसान आंदोलन की आतंकवादियों की सांठगांठ बात होने लगी है। रिहाना को पैसे देकर ट्वीट कराने का प्रचार हो रहा है। ग्रेटा पर दिल्ली में मुकदमा दर्ज किया है। मगर रिहाना और ग्रेटा अपने रुख पर कायम हैं। गायिका रिहाना दुनिया में मोदी से ज्यादा लोकप्रिय हैं, रिहाना के ट्वीटर पर दस करोड़ से अधिक फॉलोअर्स हैं। जबकि मोदी के छह करोड़ फॉलोअर्स हैं। 

रिहाना ने सिर्फ एक लाइन ट्वीट करके अपने विवेक और भावनाओं का इजहार किया कि हम किसान आंदोलन के बारे में बात क्यों नहीं करते’, रिहाना के इस ट्वीट के बात ग्रेटा थनबर्ग, मीना हैरिस और अभिनेता अमांडा. वगैरहवगैरह किसानों की हिमायत में खड़ी हो गईं। उनका कहना है कि इंसानियत और जमूहरियत को बचाने के लिए आवाज उठाना हस्तक्षेप नहीं हैं। मुझे पता नहीं था कि रिहाना के ए्क ट्वीट इतना असर दिखाएगा कि भारत की एकता अखंडता उसका वर्चस्व प्रजातंत्र सब खतरे में पड़ जाएगा। हर ओर हाहाकार मच जाएगा। रिहाना और ग्रेटा के ट्वीट ने तो बॉलीवुड के सोये हुए लोगों को भी जगा दिया, जो दो महीने से किसानों के मुद्दे पर चुप थे, क्या ही बेहतर होता, उनमें रीढ़ की हड्डी होती और ये स्वयं अन्नदाता के हक में हक की आवाज बनते, न कि उनकी आवाज उठाने वाले रिहाना और ग्रेटा का विरोध करते। लेकिन इसके इतर रिहाना और ग्रेटा के खिलाफ एक के एक ट्वीट छोड़े जा रहे हैं। जो इस बात के प्रतीक हैं कि बालीवुड किस हद तक सरकार का दरबारी बन चुका है।

विडंबना तो यह भी है कि भारतीय सेलीब्रिटीज, विदेशी सेलीब्रिटीज रिहाना, ग्रेटा और अमांडा जैसे लोगों को किसानों की हालत पर ट्वीट करना पड़ रहा है। हिन्दुस्तानी प्रजातंत्र और उसकी सुरक्षा की आवाज उठानी पड़ रही है लेकिन जब आप जुर्म पर चुप रहेंगे तो बाहर वाले आवाज उठाएंगे ही यह प्रकृति का स्वभाव है और अब जब ये लोग कह रहे हैं कि ये सब पैसे देकर कराया गया है, तो जिन-जिन वैश्विक सेलीब्रिटीज ने किसानों की हिमायत की है, उनका बैकग्राउंड खंगाला जाए तो पता चल जाएगा कि वैश्विक स्तर पर ये सेलीब्रिटीज कितनी उच्च और स्वच्छ छवि रखती हैं। रिहाना की मल्कियत 44.8 करोड़ की है। जो बॉलीवुड के बहुत सारे स्टार की संपत्ति से कहीं ज्यादा है। रिहाना समाजसेवा और रचनात्मक कार्याे में जुनून की हद तक दिलचस्पी लेती हैं। उन्होंने कोविड के दौर में जो रकम खर्च की है। वह बॉलीवुड स्टार की संपत्ति और कमाई से कहीं ज्यादा है। पुरानी कहावत है कि जो जैसा होता है उसकी सोच भी वैसी ही होती है। भारतीय फिल्म स्टार किस तरह से पैसा लेकर किसी की वकालत करते हैं, दो तीन वर्ष पूर्व चर्चित वेब पोर्टल, कोबरा पोस्ट इसको एक्सपोज कर चुका है। 

रिहाना ने ट्वीट करके इतना ही तो कहा था कि हम किसान आंदोलन पर बात क्यों नहीं कर रहे हैं। सिर्फ एक ट्वीट ने अंधभक्तों को ऐसा बौखला दिया कि अब ये अंधभक्त राष्ट्रीय स्तर पर उपवास बन रहे थे अब विश्व स्तर पर भी इनका मजाक उड़ाया जा रहा है। चलिए मान लेते हैं कि किसी विदेशी को भारत के अंदरूनी मामले में बोलने की जरूरत नहीं है। तो फिर इस पर क्या कहेंगे कि जब कैपिटल हिल के वाक्य पर हर खास और आम भारतीय आलोचना कर रहा था। क्या यह अमेरिका के आंतरिक मामले में दखल नहीं ? इससे पूर्व एक अमेरिकी श्वेत जार्ज फ्लाइट की पुलिस द्वारा बेदर्दी से मारे जाने पर हिन्दुस्तान के इन नेताओं और फिल्म सितारों ने ट्वीट किया था। क्या यह दखल नहीं। अबकी बार ट्रंप सरकार क्या अमेरिका के आंतरिक मामले में दखल नहीं ? ट्रंप की जीत के लिए भारत में पूजा पाठ, हवन क्या यह दखल नहीं। और तो और दर्जनों विदेशी सांसदों को भारत बुलाकर कश्मीर के बारे में बयान दिलवाना भारत के आंतरिक मामले में दखल नहीं। 

26 जनवरी को लालकिले पर जिस तरह से झंडा फहराया गया, उसकी भत्र्सना हो रही है और होनी भी चाहिए। लेकिन इस हवाले से किसान आंदोलन को देश विरोधी कहना, खालिस्तानी, पाकिस्तानी, चीन या फिर दूसरे देशों से जोडऩा, मुल्क तोडऩे वाला आंदोलन कहना, दरअसल स्वयं देशविरोधी वक्तव्य हैं। 75 दिनों से किसान त्याग, बलिदान के प्रतीत बने हुए ठंडी सडक़ों पर खुले आसमान के नीचे बैठे हैं। दिल्ली की सीमाओं पर अपनी जायज मांगों को लेकर एकजुट होकर आंदोलन कर रहे हैं। लेकिन उसे केवल पंजाब का आंदोलन नहीं कहा जा सकता है, उन्हें राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, तेलंगाना तमिलनाडु से लेकर मध्य प्रदेश उत्तर प्रदेश और बिहार तक हर प्रांत से समर्थन मिल रहा है। देशभर में किसानों की हिमायत में 28 से अधिक महापंचायतें हो चुकी हैं। आप इसे देशविरोधी आंदोलन नहीं कह सकते हैं। किसान आंदोलन के दौर में मीडिया का चेहरा भी बड़ा शर्मनाक है। न्यूज चैनलों की बौद्धिक नीचता और पत्रकारिता का ढलान चरम सीमा पर है। उन्हें रिहाना के रूप में एक टॉनिक मिल गया है। मीडिया में स्वयंभू राष्ट्रवाद की हुंकार मची हुई है। किसान किस परेशानी से जूझ रहे हैं। उसको दिखाने के बजाय नये-नये एंगिल से उन्हें बदनाम करने की होड़ मची हुई है। निश्चित रूप से 26 जनवरी के गुनहगारों को सजा मिलनी चाहिए। लेकिन तिरंगा उतारकर किसका झंडा लहराया गया, कहां लहराया गया, इसकी जांच की बात कोई नहीं उठाता। 

मीडिया को यह बात भी बतानी चाहिए कि किसानों की लड़ाई अहंकार की नहीं हक की लड़ाई है। अगर किसान कृषि कानूनों से संतुष्ट नहीं हैं तो सरकार उसे वापस ले ले। वैसे भी सरकार इसे साल दो साल के लिए टालने के लिए तैयार है। बहरहाल जरूरत इस बात की है कि रिहाना ने क्या कहा और क्या नहीं। इस पर माथापच्ची करने के बजाय। इस पर गौर होना चाहिए। देश का इतना बड़ा आंदोलन कैसे समाप्त हो गया। जहां किसी का दिल न दुखे। किसी की हार न हो। सरकार भी इसे अपनी हार या अहंकार का मुद्दा न बनाए। देश को रिहाना और ग्रेटा में न उलझाए। आंदोलन को बदनाम करने के बजाय सकारात्मक सोच और बड़े दिल से इसका हल सोचने की जरूरत है। 

बकौल शायर —

ये राहें ही ले जाएंगी मंजिल तक, हौंसला रख,

कभी सुना है कि अंधेरों ने सवेरा होने न दिया।”

(लेखक सैयद फैसल अली राजद के वरिष्ठ नेता हैं।)

 

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